बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने दहेज मृत्यु के एक पुराने मामले में अहम फैसला सुनाते हुए पति को दोषमुक्त कर दिया है। न्यायमूर्ति रजनी दुबे की एकलपीठ ने वर्ष 2007 में ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई सजा को रद्द करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष दहेज की मांग और मौत से ठीक पहले क्रूरता को साबित करने में असफल रहा है।
प्रकरण के अनुसार बलौदाबाजार निवासी उदय भारती की पत्नी सीमा की 6 नवंबर 2006 को फांसी लगने से मौत हो गई थी। इस मामले में ट्रायल कोर्ट ने उदय भारती को भारतीय दंड संहिता की धारा 304-बी (दहेज मृत्यु) के तहत 7 वर्ष तथा धारा 498-ए (दहेज प्रताड़ना) के तहत 3 वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। ट्रायल कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ आरोपी पति ने हाईकोर्ट में अपील दायर की थी।
हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड पर उपलब्ध साक्ष्यों का गहन परीक्षण करते हुए माना कि मृतका की मौत आत्महत्या थी, न कि हत्या। कोर्ट ने कहा कि दहेज मांग और प्रताड़ना को लेकर गवाहों के बयान सामान्य, आपसी विरोधाभास से भरे और अप्रमाणित हैं। साथ ही, मौत से ठीक पहले दहेज के लिए क्रूरता का कोई ठोस और विश्वसनीय प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया जा सका।
अदालत ने यह भी महत्वपूर्ण माना कि मृतका के माता-पिता और अन्य परिजनों ने कथित प्रताड़ना के संबंध में कभी पुलिस में शिकायत दर्ज नहीं कराई, न ही परिवारों के बीच किसी प्रकार की बैठक या मध्यस्थता का प्रमाण सामने आया।
स्वतंत्र गवाह ने नहीं किया समर्थन
मामले में मकान मालकिन, जो एक स्वतंत्र गवाह थीं, उन्होंने भी न्यायालय में बयान दिया कि पति-पत्नी सामान्य रूप से रह रहे थे। केवल आरोपी के शराब पीने की बात सामने आई, जिसे कोर्ट ने दहेज प्रताड़ना की श्रेणी में नहीं माना।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसलों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि केवल सामान्य और अस्पष्ट आरोपों के आधार पर दहेज मृत्यु का अपराध सिद्ध नहीं किया जा सकता, जब तक कि कानून की अनिवार्य शर्तें पूरी न हों। अंततः हाईकोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए ट्रायल कोर्ट का फैसला निरस्त कर दिया और आरोपी पति को सभी आरोपों से बरी कर दिया।



