चुनाव पूर्व किए गए वादों के पूरा न होने से नाराज छत्तीसगढ़ के शिक्षकों ने शुक्रवार को एकदिवसीय हड़ताल कर सरकार के खिलाफ जोरदार विरोध दर्ज कराया। प्रदेशभर में सरकारी स्कूलों में पढ़ाई ठप रही और सभी जिला मुख्यालयों में प्रदर्शन हुआ

राजनांदगांव 17 जनवरी 2026। छत्तीसगढ़ में शुक्रवार का दिन सरकारी शिक्षा व्यवस्था के लिए एक कड़ा संदेश लेकर आया। प्रदेश के अधिकांश सरकारी स्कूलों में न तो कक्षाएं लगीं और न ही बच्चों की चहल-पहल दिखी। स्कूलों के गेट पर ताले लटके रहे और शिक्षक सड़कों पर नजर आए। सहायक शिक्षक समग्र शिक्षक फेडरेशन के आह्वान पर हुई एकदिवसीय हड़ताल ने यह साफ कर दिया कि शिक्षकों का सब्र अब जवाब दे चुका है। इस दौरान राजनांदगांव में प्रदेश संयोजक मनीष मिश्रा की अगुवाई में जोरदार प्रदर्शन हुआ।
मनीष मिश्रा ने अपने संबोधन में कहा कि सरकार ने चुनाव से पहले जिन वादों और गारंटियों के दम पर सत्ता हासिल की, वे अब फाइलों तक सीमित होकर रह गए हैं। खास तौर पर “मोदी की गारंटी” के नाम पर किए गए ऐलान आज भी जमीनी हकीकत से कोसों दूर हैं। इसी उपेक्षा के खिलाफ शिक्षकों ने संगठित होकर सरकार को चेतावनी दी है।
इस हड़ताल को दर्जन भर से अधिक शिक्षक संगठनों का समर्थन मिला, जिससे आंदोलन को व्यापक रूप मिला। परिणामस्वरूप प्रदेश के सभी 33 जिला मुख्यालयों में एक साथ धरना-प्रदर्शन हुआ। राजधानी रायपुर से लेकर सरगुजा, बस्तर, दुर्ग, बिलासपुर और राजनांदगांव तक शिक्षकों का “हल्ला बोल” साफ तौर पर देखने को मिला। कई जगहों पर कलेक्टर कार्यालयों के सामने शिक्षकों ने नारेबाजी कर ज्ञापन सौंपे और सरकार की नीतियों पर सवाल खड़े किए।
इस पूरे आंदोलन में प्रदेश संयोजक मनीष मिश्रा की भूमिका अहम रही। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि शिक्षकों के साथ हो रही अनदेखी अब स्वीकार्य नहीं है। मनीष मिश्रा ने अपने संबोधन में स्पष्ट किया कि यह हड़ताल अंतिम नहीं, बल्कि एक चेतावनी है। यदि सरकार ने अब भी गंभीरता नहीं दिखाई, तो आने वाले दिनों में प्रदेशभर के लाखों शिक्षक राजधानी की ओर कूच करेंगे और आंदोलन को और व्यापक रूप दिया जाएगा।
वहीं शिक्षक संगठनों का यह भी कहना है कि संगठन को एकजुट रखने और आंदोलन को दिशा देने में रविंद्र राठौर की भूमिका निर्णायक रही है। जिला स्तर से लेकर प्रदेश स्तर तक रणनीति बनाकर शांतिपूर्ण लेकिन प्रभावशाली प्रदर्शन करना, उनके नेतृत्व की क्षमता को दर्शाता है। शिक्षकों की बिखरी आवाज को एक मंच पर लाने का श्रेय भी संगठन के भीतर उनके प्रयासों को दिया जा रहा है।
चार सूत्रीय मांगों ने पकड़ा जोर
फेडरेशन ने सरकार के सामने स्पष्ट किया है कि शिक्षक कोई नई मांग नहीं कर रहे, बल्कि उन्हीं वादों की याद दिला रहे हैं जो खुद सरकार ने किए थे। आंदोलन की प्रमुख मांगों में सहायक शिक्षकों की वेतन विसंगति दूर करना, एलबी संवर्ग शिक्षकों को क्रमोन्नत वेतनमान देना, पूर्व सेवा की गणना कर शिक्षा विभाग में सभी लाभ प्रदान करना, टेट की अनिवार्यता समाप्त करना और निजी मोबाइल से VSK ऐप के जरिए उपस्थिति दर्ज कराने की व्यवस्था बंद करना शामिल है।
शिक्षकों का कहना है कि जब तक इन मुद्दों पर ठोस और लिखित निर्णय नहीं लिया जाता, तब तक संघर्ष जारी रहेगा। आज की हड़ताल ने सरकार को यह साफ संकेत दे दिया है कि शिक्षा व्यवस्था से जुड़े लोगों की अनदेखी अब भारी पड़ सकती है। सवाल यही है—क्या सरकार इस चेतावनी को सुनेगी, या फिर आने वाले दिनों में स्कूलों पर लगे ताले एक नई सामान्य तस्वीर बन जाएंगे?
