रायपुर।
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कोर्ट परिसर में हंगामा करने, पुलिसकर्मियों से बदसलूकी करने और शासकीय कार्य में बाधा डालने के गंभीर आरोपों का सामना कर रहे दो आरोपियों को अग्रिम जमानत देने से इनकार कर दिया है। हाईकोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि कोई भी व्यक्ति या समूह कानून को अपने हाथ में नहीं ले सकता, चाहे वह विरोध या प्रदर्शन के नाम पर ही क्यों न हो।
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा ने 6 जनवरी को संजीत कुमार बर्मन और अमृत दास दाहरिया द्वारा दायर अग्रिम जमानत याचिकाओं को खारिज करते हुए कहा कि सार्वजनिक सेवकों, विशेषकर न्यायिक प्रक्रिया से जुड़े अधिकारियों के साथ intimidation, अवरोध या हिंसा न्याय व्यवस्था की जड़ पर प्रहार है। अदालत ने स्पष्ट किया कि कोर्ट परिसर निष्पक्ष, गरिमामय और अतिक्रमण-रहित स्थान हैं, जिन्हें किसी भी सूरत में विरोध-प्रदर्शन का मंच नहीं बनाया जा सकता।
मामला 15 नवंबर 2025 का है, जब बिलासपुर कोर्ट परिसर में एक अन्य प्रकरण में गिरफ्तार कथावाचक आशुतोष चैतन्य को पेश किए जाने के दौरान कथित तौर पर एक भीड़ अवैध रूप से एकत्र हो गई। अभियोजन के अनुसार, भीड़ ने कोर्ट रूम में प्रवेश कर नारेबाजी की, आरोपी को धमकाया और स्थिति नियंत्रित करने पहुंचे पुलिसकर्मियों के साथ हाथापाई कर उनके शासकीय कर्तव्यों में बाधा डाली। इसके बाद सिविल लाइंस थाना में भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज की गई।
आरोपियों ने स्वयं को निर्दोष बताते हुए एफआईआर को राजनीतिक दबाव में दर्ज की गई “काउंटर ब्लास्ट” बताया, लेकिन कोर्ट ने आरोपों को गंभीर मानते हुए रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री से उन्हें प्रथम दृष्टया सही पाया। न्यायालय ने दोनों आरोपियों के आपराधिक पूर्ववृत्त पर भी ध्यान दिया—एक के खिलाफ पूर्व में मामला दर्ज है, जबकि दूसरे के विरुद्ध विभिन्न थानों में कई प्रकरण लंबित हैं। कोर्ट ने कहा कि ऐसे पूर्व आचरण के कारण वे विवेकाधीन राहत के पात्र नहीं हैं।
सह-आरोपी को दी गई अग्रिम जमानत के आधार पर समानता (parity) की दलील को भी अदालत ने खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि उस सह-आरोपी को शैक्षणिक परीक्षाओं और आपराधिक इतिहास न होने के कारण राहत दी गई थी, जबकि वर्तमान आवेदकों की भूमिका और पृष्ठभूमि अलग है।
हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि अग्रिम जमानत का उद्देश्य उन व्यक्तियों को संरक्षण देना नहीं है, जो प्रथम दृष्टया सार्वजनिक व्यवस्था और न्यायिक संस्थाओं की पवित्रता को कमजोर करने वाले कृत्यों में शामिल प्रतीत होते हैं। ऐसे मामलों में राहत देना समाज को गलत संदेश देगा और न्याय प्रणाली में जनता का विश्वास कमजोर करेगा।
अंत में अदालत ने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में सामाजिक हित व्यक्तिगत स्वतंत्रता से ऊपर है, और आरोपों की गंभीरता व आवेदकों के पूर्व आचरण को देखते हुए अग्रिम जमानत नहीं दी जा सकती। इसके साथ ही दोनों याचिकाएं खारिज कर दी गईं।
कोर्ट परिसर की पवित्रता से समझौता नहीं: पुलिस से बदसलूकी के दो आरोपियों को हाईकोर्ट से अग्रिम जमानत नहीं



