छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कर्मचारी की मौत से जुड़े एक महत्वपूर्ण मुआवजा मामले में नियोक्ता को बड़ी राहत देने से इनकार करते हुए स्पष्ट किया है कि कार्यस्थल पर हुई मृत्यु की स्थिति में नियोक्ता अपनी वैधानिक जिम्मेदारी से नहीं बच सकता, भले ही कर्मचारी ठेकेदार के माध्यम से कार्यरत रहा हो।
यह अहम फैसला न्यायमूर्ति बिभु दत्त गुरु ने डायरेक्टर, वेलकम डिस्टिलरी बनाम ईश्वरी बाई एवं अन्य मामले में सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि कर्मचारी क्षतिपूर्ति अधिनियम, 1923 के तहत कार्य के दौरान हुई मृत्यु के लिए नियोक्ता मुआवजा देने के लिए बाध्य है।
मामले के अनुसार, अर्जुन कैवर्त (मृतक) 25 अगस्त 2014 को वेलकम डिस्टिलरी, छेरकाबांधा, जिला बिलासपुर में भूसा उतारने और बॉयलर में फीडिंग का कार्य कर रहा था। इसी दौरान फैक्ट्री परिसर में गैस अथवा केमिकल लीक होने से उसकी तबीयत अचानक बिगड़ गई। वह परिसर के भीतर ही गिर पड़ा और इलाज से पहले उसकी मौत हो गई।
मृतक की पत्नी ईश्वरी बाई, दो पुत्र और पिता ने कर्मचारी क्षतिपूर्ति अधिनियम, 1923 के तहत श्रम न्यायालय में दावा प्रस्तुत कर मुआवजे की मांग की थी। श्रम न्यायालय द्वारा मुआवजा दिए जाने के आदेश को चुनौती देते हुए नियोक्ता ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी।
हाईकोर्ट ने नियोक्ता की दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि मृतक कार्यस्थल पर ड्यूटी के दौरान दुर्घटना का शिकार हुआ, इसलिए नियोक्ता मुआवजा देने से बच नहीं सकता। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि ठेकेदार के माध्यम से कार्य कराए जाने का तर्क नियोक्ता की जिम्मेदारी समाप्त नहीं करता।
इस फैसले को श्रमिक अधिकारों की दिशा में एक महत्वपूर्ण निर्णय माना जा रहा है, जिससे भविष्य में ऐसे मामलों में कर्मचारियों के आश्रितों को न्याय मिलने का रास्ता और मजबूत हुआ है।



