
दुर्ग। संगोष्ठी के द्वितीय दिवस का प्रारंभ तकनीकी सत्र से हुआ, जिसके अंतर्गत रिसोर्स पर्सन डॉ. नीरूपमा शर्मा ने इंडियन फिलोसोफिकल स्कूल (न्याय, मीमांसा, सांख्य) एण्ड लॉजिक फॉर ए रीजनिंग प्रस्तुतीकरण किया। उन्होंने भारतीय ज्ञान प्रणाली के संदर्भ में आधुनिक तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के उपयोग पर विस्तार से विचार प्रस्तुत किए, जिसे प्रतिभागियों द्वारा सराहा गया। तत्पश्चात विभिन्न शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों ने भारतीय ज्ञान परंपरा एवं कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर अपना प्रस्तुतीकरण दिया।
द्वितीय दिवस के समापन सत्र में मुख्य अतिथि डॉ. बी. रघु विशिष्ट अतिथि श्री डेकेश्वर वर्मा, विशेष अतिथि डॉ. अंकित राजपाल एवं डॉ. शिशिरकर्णा भट्टाचार्य उपस्थित रहे। मुख्य अतिथि डॉ. वी. रघु ने अपने वक्तव्य में शिक्षा, संस्कृति और तकनीक समन्वय को ही राष्ट्र निर्माण की सशक्त आधारशिला की संज्ञा दिए। उन्होंने विद्यार्थियों को नवाचार एवं अनुसंधान के क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। विशिष्ट अतिथि श्री डेकेश्वर वर्मा ने ऐसे अकादमिक आयोजनों को ज्ञानवर्धन एवं बौद्धिक विकास का प्रभावी माध्यम बताया।
समापन अवसर पर प्रतिभागियों को प्रतिभागिता एवं प्रस्तुतिकरण के उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए तीन प्रतिभागियों को बेस्ट पेपर अवॉर्ड दिया गया। प्रमाण पत्र प्रदान किए गए। संगोष्ठी के सफल आयोजन में संस्था के डायरेक्टर श्री महेंद्र चौबे, मुख्य संरक्षक डॉ. दिव्या शर्मा द्वारा उद्बोधन दिया गया। कार्यक्रम की रिपोर्ट प्राचार्य डॉ. स्वाति श्रीवास्तव के द्वारा प्रस्तुत की गई, आयोजन सचिव डॉ. गुंजन शर्मा द्वारा समापन सत्र प्रस्तुत की रूपरेखा प्रस्तुत की गई। प्रशासनिक अधिकारी सुधीर तिवारी एवं तकनीकी सहयोग में डिगेश साहू, जीतेश साहू का विशेष योगदान रहा। डॉ. प्रियंका तिवारी द्वारा धन्यवाद ज्ञापन दिया गया। संपूर्ण संगोष्ठी का मंच संचालन सह संरक्षक डॉ. रोली तिवारी, भावना क्षत्रिय, मीना पांडेय एवं डॉ. प्रियंका तिवारी द्वारा किया गया। यह द्वितीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी अकादमिक उत्कृष्टता, शोध संवर्धन एवं भारतीय ज्ञान प्रणाली को वैश्विक मंच पर प्रस्तुत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण और सफल पहल सिद्ध हुई। इस दो दिवसीय सेमिनार में देश-विदेश के 300 प्रतिभागियों ने अपनी उपस्थिति दर्ज की एवं 70 प्रतिभागियों ने अपने शोध पत्र प्रस्तुत किए। आयोजन को सफल बनाने में सांदीपनी एकेडमी अछोटी एवं वीतराग रिसर्च फाउंडेशन के सभी सदस्यों का महत्वपूर्ण योगदान रहा।
