
दुर्ग। बायोटेक्नोलॉजी विभाग, शासकीय विश्वनाथ यादव तामस्कर स्नातकोत्तर स्वशासी महाविद्यालय, दुर्ग के शोधार्थी सोमेंद्र कुमार ने मधुमेह (डायबिटीज़ मेलिटस) के उपचार के लिए एक नई संभावित हर्बल दवा “फ्राइडेलिन” की खोज की है। यह खोज मधुमेह जैसी वैश्विक महामारी के लिए एक सुरक्षित, प्रभावी और वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित समाधान प्रस्तुत कर सकती है। यह उपलब्धि न केवल प्रदेश के लिए गर्व का विषय है, बल्कि देश के हर्बल और बायोमेडिकल शोध को भी एक नई दिशा प्रदान करती है। यह शोधकार्य प्रो. अनिल कुमार, प्राचार्य, शासकीय काकतीय पी.जी. कॉलेज, जगदलपुर के मार्गदर्शन में तथा बायोटेक्नोलॉजी विभाग, शासकीय वि.या.ता. महाविद्यालय, दुर्ग के अनुसंधान केंद्र में सम्पन्न हुआ।
आज डायबिटीज़ विश्व में सबसे तेजी से बढ़ने वाली बीमारियों में से एक है। यह विश्वभर में तीव्र गति से फैलने वाला एक चयापचयी विकार है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लू.एच.ओ.) के अनुसार नई, सुरक्षित और प्रभावी दवाओं की तत्काल आवश्यकता है। इसी उद्देश्य से शोधार्थी ने पारंपरिक औषधीय पौधे ब्रिडेलिया रेटुसा (स्थानीय नाम कसही) का वैज्ञानिक मूल्यांकन किया। यह पौधा ग्रामीण व जनजातीय समुदायों में वर्षों से मधुमेह व अनेक रोगों के उपचार में उपयोग किया जाता रहा है, परन्तु वैज्ञानिक प्रमाणीकरण के अभाव में आधुनिक चिकित्सा में इसका स्थान सुनिश्चित नहीं हो पाया था।
ब्रिडेलिया रेटुसा से प्राप्त प्राकृतिक ट्राइटरपेनॉइड फ्राइडेलिन में शक्तिशाली एंटीऑक्सिडेंट, एंटी-इंफ्लेमेटरी, एंटी-डायबिटिक और ऑर्गन-प्रोटेक्टिव गुण पाए जाते हैं। यह ग्लूकोज मेटाबॉलिज़्म को नियंत्रित, इंसुलिन स्राव को संतुलित करता है तथा अग्न्याशय की बीटा-कोशिकाओं की सुरक्षा और पुनर्जनन को बढ़ावा देता है। साथ ही α-एमाइलेज़ एवं α-ग्लूकोसिडेज़ अवरोधन, DPP-4, PTP1B, GSK-3β जैसे एंज़ाइमों पर नियंत्रण और लिवर-किडनी संरक्षा के माध्यम से समग्र ग्लूकोज होमियोस्टेसिस बनाए रखता है। यह अध्ययन फाइटोकेमिकल विश्लेषण, इन-विट्रो, इन-विवो और इन-सिलिको तकनीकों द्वारा प्रमाणित किया गया है, जिससे फ्राइडेलिन को आधुनिक औषधि-विकास हेतु एक महत्वपूर्ण लीड मोलेक्यूल के रूप में स्थापित किया गया तथा भारतीय पारंपरिक ज्ञान (IKS) को वैज्ञानिक आधार प्रदान हुआ।
यह शोध आधुनिक जीवनशैली से बढ़ती डायबिटीज़ की समस्या के लिए फ्राइडेलिन आधारित एक सुरक्षित, सस्ता और प्राकृतिक विकल्प प्रस्तुत करता है। यह प्री-डायबिटिक अवस्थाओं की रोकथाम में सहायक होने के साथ-साथ नई एंटी-डायबिटिक दवा के विकास का मार्ग भी प्रशस्त करता है। साथ ही, पारंपरिक औषधीय ज्ञान को वैज्ञानिक प्रमाण देकर हर्बल उद्योग, किसानों और पर्यावरणीय संरक्षण के लिए नए अवसर प्रदान करता है।
प्राचार्य प्रो. ए.के. सिंह ने इस शोध को “संस्थान एवं छत्तीसगढ़ के लिए असाधारण वैज्ञानिक प्रगति” बताते हुए कहा कि यह उपलब्धि न केवल भविष्य में डायबिटीज़ उपचार के क्षेत्र को नई दिशा देगी, बल्कि राज्य को औषधीय अनुसंधान की अग्रिम पंक्ति में स्थापित करने की क्षमता भी रखती है। इस शोध के लिए डॉ. श्वेता पांडेय, प्रमुख, विभाग बायोटेक्नोलॉजी, प्रो. जगजीत कौर सलूजा, प्रो. अनुपमा अस्थाना, प्रो. प्रशांत श्रीवास्तव, प्रो. गोवर्धन सिंह ठाकुर, डॉ. मोतीराम साहू, डॉ. निखिल मिश्रा, डॉ. दिनेश कुमार, डॉ. सतीश सेन, और डॉ. श्रीराम कुंजाम ने शोधकर्ता को हार्दिक बधाई दी। शोधकर्ता को वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद् (सीएसआईआर) जेआरएफ फेलोशिप के सहयोग से यह शोध कार्य सफलतापूर्वक संपन्न करने का अवसर मिला, जिसने पूरे अनुसंधान की प्रक्रिया को सुचारू बनाने और उच्च गुणवत्ता के परिणाम प्राप्त करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।


