
मां दूसरों के घरों में बनाती थीं खाना, पिता पैरालाइज्ड… आज पूरे मोहल्ले की ‘यामिनी मैडम’ पर गर्व
दुर्ग-भिलाई |
भिलाई के कोसा नगर की संकरी गलियों में इन दिनों उत्सव जैसा माहौल है। जहां कभी रोज़ की जद्दोजहद और संघर्ष की कहानियां सुनाई देती थीं, वहीं अब एक ही नाम की गूंज है—यामिनी सिदार, जो अब DSP बन चुकी हैं। CGPSC में उन्होंने ओवरऑल 378वीं रैंक और कैटेगरी में 23वीं रैंक पाई है। यह सफलता सिर्फ उनकी नहीं, बल्कि उस पूरे परिवार और मोहल्ले की जीत है जिसने हर मुश्किल में उनका साथ दिया।
संघर्ष जो कहानी बना: 2021 में पिता पैरालाइज्ड हुए, घर की जिम्मेदारी बढ़ी
यामिनी का बचपन किसी सामान्य परिवार जैसा दिखता जरूर था, लेकिन उसकी परतों में संघर्ष भरा पड़ा था। पिता अशोक सिदार फिल्टर प्लांट में पंप ऑपरेटर थे।
लेकिन 2021 में अचानक पैरालाइज्ड होने के बाद वे उसी जगह गार्ड की नौकरी करने लगे। पढ़ाई बीच में छूट जाने का मलाल उन्हें जिंदगीभर रहा।
एक दिन अपनी बेटी से कहा—
“मैं अफसर बनना चाहता था, लेकिन बन नहीं सका… अगर मेरी बेटी बन जाए, तो लगेगा मेरा सपना उसने पूरा कर दिया।”
यामिनी ने पिता की ये बात दिल में उतार ली। वह संकल्प बन गया।
मां ने दूसरे के घरों में खाना बनाया, बहन ने ट्यूशन पढ़ाया
घर की हालत हमेशा तंग रही। पढ़ाई, किताबें, कोचिंग—सबका खर्च लगातार बढ़ता गया।
तब मां शारदा सिदार ने मोहल्ले में लोगों के घर खाना बनाना शुरू किया। छोटी बहन भूमिका ने ट्यूशन पढ़ाकर मदद की।
घर का हर सदस्य बस एक ही लक्ष्य लिए आगे बढ़ रहा था—
यामिनी पढ़ेगी, आगे बढ़ेगी, और एक दिन अफसर बनकर लौटेगी।
दो बार असफल, लेकिन नहीं टूटा हौसला… तीसरे प्रयास में मिली जीत
यामिनी स्वीकार करती हैं—
“पिता की हालत देखकर कई बार लगा कि छोड़ दूं। दो बार एग्जाम में असफल हुई तो निराशा और बढ़ गई।”
लेकिन दोस्त, परिवार और शिक्षकों ने हिम्मत दी।
दुर्ग कलेक्टर डॉ. सर्वेश्वर नरेंद्र भूरे द्वारा आयोजित CGPSC टॉपर टॉक में शामिल होने से उन्हें नई ऊर्जा मिली।
और आखिरकार तीसरे प्रयास में उन्होंने इतिहास रच दिया।
मोहल्ले में दो दिनों तक काम पर नहीं गईं महिलाएं
यामिनी के चयन की खबर मिलते ही पूरी बस्ती जश्न में डूब गई।
महिलाएं खुशियों से इतनी अभिभूत थीं कि दो दिनों तक किसी ने काम पर जाना उचित नहीं समझा।
वे कहती हैं—
“आज हमारी बेटी DSP बनी है… इससे बड़ी खुशी क्या होगी!”
हर घर में ढोल, ढाक, नृत्य और मिठाई के दौर चलते रहे। यामिनी के घर पहुंचते ही केक काटा गया। मोहल्ले के लोग उन्हें गाड़ी में बैठाकर पूरे इलाके में घुमाने निकले।
हर साल बाढ़ में डूबने वाला घर, पर सपने कभी नहीं डूबे
कोसा नगर की बस्ती निचले इलाकों में बसी है।
ज्यादा बारिश होते ही घर पानी में भर जाता है।
पिछले साल यामिनी के घर में भी बाढ़ का पानी भर गया था।
यामिनी कहती हैं—
“हर बार ये देखकर लगता था कि मुझे इस हालात से बाहर निकलना है। और इसी सोच ने मुझे आगे बढ़ाया।”
अब वह पूरे क्षेत्र की लड़कियों की प्रेरणा हैं
यामिनी चाहती हैं कि उनके जैसी परिस्थितियों में रहने वाली लड़कियां कभी हार न मानें।
उनकी सफलता ने पूरे मोहल्ले को एक नई उम्मीद दी है।
निष्कर्ष
यामिनी की सफलता केवल एक लड़की की कहानी नहीं—
यह उस संघर्ष, त्याग, मेहनत और भरोसे की कहानी है,
जो किसी भी बस्ती की गलियों से निकलकर चमकते सितारे बन सकती है।
आज कोसा नगर की हर आंख में चमक है—
क्योंकि उनकी यामिनी अब DSP मैडम बन चुकी हैं।

